मनमानी

बीते लम्हे फिर न लौटेंगे अधुरे छोडे फराईज की फिक्र कर ।
इन्सानियत जब भी छुटी हो तुझसे याद उसे जरूर कर ।
तमाशा बन जाए जीन्दगी कीसी की खेल ऐसे न खेला कर ।
बोहत होगयी मनमानी बाकी बचे पलो का सही इस्तमाल कर।.

5 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 05/08/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/08/2016
  3. babucm babucm 05/08/2016
  4. mani mani 05/08/2016

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