हर्फ-हर्फ गवाही निकली

***गज़ल***

नज़र-ए-महरूम से कल फ़िर वही खुदाई निकली,
मैं जो रोया तो बूंद-बूंद सियाही निकलीl

कल फ़िर से ख्वाबगाहों की तलाशी में फक़त,
हर दरख्त पर बैठी हुई तन्हाई निकलीl

अपनी सांसो से मुखातिब हो यही महसूस किया मैने,
सांस-सांस मेरी मुझसे परायी निकलीl

इक वही शक़्स निगाहों से नहीं जाता है,
बाद उसके तो ये शय पथरायी निकलीl

उसकी कमी ना रही ये भरम कुछ यूं टूटा,
कि दिल में उसकी जगह एक अज़ल खायी निकलीl

मैने मुहब्बत का इकबाल-ए-जुर्म जब किया “सागर”,
मेरी कलम से हर्फ-हर्फ गवाही निकलीll

नजर-ए-महरूम से कल फ़िर वही खुदाई निकली,
मैं जो रोया तो बूंद-बूंद सियाही निकलीllll

17/08/2012

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-Er Anand Sagar Pandey

5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/08/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/08/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/08/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 04/08/2016