अँखियों का कसूर

दिख रहे थे पास अब क्यूँ लगते वो दूर हैं ।
बढ़ वो चले या फिर अँखियों का कसूर है ।
मंजिल ही जुदा है या इरादा ही नेक नहीं,
राह के हमसफ़र अब बदले-बदले हुजूर हैं ।
चाँद दिखना ही था क्यूँ अँधेरे की ओट ली,
नज़रों का धोखा है या फिर वो ही मजबूर हैं ।
रात तो ढल चुकी पर नींद न आँखों में थी,
ख्वाब और हकीकत के द्वन्द में जरूर हैं ।
वक़्त की पुकार पर चौंक वो ऐसे गए,
जैसे किसी ख्वाब का चढ़ा हुआ सुरूर है ।

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com

16 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/08/2016
  2. mani mani 04/08/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/08/2016
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma (bindu) 04/08/2016
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 04/08/2016
  6. sarvajit singh sarvajit singh 04/08/2016

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