नव प्रेम-राग सिरजाय चली-रामबली गुप्ता

पद्य : शृंगारिक

लच-लचक-लचक लचकाय चली,
कटि-धनु से शर बरसाय चली।
कजरारे चंचल नयनों से,
हिय पर दामिनि तड़पाय चली।।1।।

फर-फहर फहर फहराय चली,
लट-केश-घटा बिखराय चली।
अलि मनबढ़ सुध-बुध खो बैठे,
अधरों से मधु छलकाय चली।।2।।

सुर-सुरभि-सुरभि सुरभाय चली,
चहुँ ओर दिशा महकाय चली।
चम्पा-जूही सब लज्जित हैं,
तन चंदन-गंध बसाय चली।।3।।

लह-लहर-लहर लहराय चली,
तन से आँचल सरकाय चली।
नव-यौवन-धन तन-कंचन से,
रति मन में अति भड़काय चली।।4।।

झन-झनन-झनन झनकाय चली,
पायल-चूड़ी खनकाय चली।
हिय के हर तार झंझोर सखे!
नव-प्रेम-राग सिरजाय चली।।5।।

रचना-रामबली गुप्ता

कटि-धनु=कमर रूपी धनुष
शर=बाण
दामिनि=बिजली
अलि=भँवरे, मनचले
सुरभि=सुगंध
सिरजाय चली=सृजन करके चली

17 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/08/2016
    • रामबली गुप्ता 04/08/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/08/2016
    • रामबली गुप्ता 04/08/2016
  3. Kajalsoni 04/08/2016
    • रामबली गुप्ता 04/08/2016
  4. Dr Chhote Lal Singh Dr Chhote Lal Singh 04/08/2016
    • रामबली गुप्ता 04/08/2016
  5. mani mani 04/08/2016
    • रामबली गुप्ता 04/08/2016
  6. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma (bindu) 04/08/2016
    • रामबली गुप्ता 04/08/2016
    • रामबली गुप्ता 04/08/2016
  7. babucm C.m.sharma(babbu) 04/08/2016
    • रामबली गुप्ता 05/08/2016
  8. Er Anand Sagar Pandey 05/08/2016

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