ऐ मेरी जान के दुश्मन

अब भी लगता है कि सीने में निहां हैं कोई,
सोचता हूं के क्या महरूम तेरी यादों से जहां है कोई l
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कल जिन दरख्तों से तेरे खतों की मुश्क उठा करती थी,
आज कुछ भी नहीं है फ़िर भी लगता है वहां है कोई l
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हुस्न है, नाज़ है और फरेबों के हुनर भी है,
ऐ मेरी जान के दुश्मन! तुझसा ज़माने में कहां है कोई l
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चल ऐ नादान दिल ! फिर अपनी गली को चलें,
अब भला कैसा ठहरना के तेरा कौन यहां है कोई ll

निहां=छुपा हुआ
मुश्क=खुश्बू

-Er Anand Sagar Pandey

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