तेरे दर से उठे कदमों को

तेरे दर से उठे कदमों को किस मंज़िल का पता दूंगा मैं,
भटक जाऊंगा तेरी राह में और उम्र बिता दूंगा मैं l

हां मगर अपने होठों पे तेरा ज़िक्र ना आने दूंगा,
इस फसाने को अज़ल के लिये दिल में दबा दूंगा मैं l

मैं वफ़ा के समन्दर का इक नायाब सा मोती हूं,
तुझपे गर सज न सका तो अपनी हस्ती को मिटा दूंगा मैं l

तेरे पहलू में कभी था तो ज़िन्दगी का गुमां था मुझको,
अब तेरी यादों के शरारे में खुद को जला दूंगा मैं l

हां मगर तुझको जमाने में मेरे नाम से जानेंगे सभी,
अपनी गज़लों में तुझे कुछ ऐसे बसा दूंगा मैं l

मैं जानता हूं कि इक दिन तुझे अफ़सोस भी होगा,
हां मगर तब तलक़ खुद को तेरी राहों से हटा दूंगा मैं l

मैं जानता हूं के मैं सागर हूं और मेरी कश्ती भी मुझी में है,
और एक दिन खुद ही इस कश्ती को खुद में डुबा दूंगा मैं ll

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-Er Anand Sagar Pandey

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