ज़िन्दगी ठहरी रही और उम्र आगे चल पड़ी

**ज़िन्दगी ठहरी रही और उम्र आगे चल पड़ी::गज़ल**

(मध्यम बहर पर)

उस ख्वाब की ताबीर जब शम्म-ए-फुगन में जल पड़ी,
तब ज़िन्दगी ठहरी रही और उम्र आगे चल पड़ी l

फ़िर कैफियत का ज़िक्र भी मुझको अजाबी हो गया,
हर कैफियत की बात पर सोज-ए-निहां पिघल पड़ी l

तू जब तलक पहलू में था ख्वाबों के दिल पर तख्त थे,
हिज़रत हुई तुझसे तो यादें सांस-सांस ढल पड़ी l

हर शय को मैंने मात दी दौर-ए-खुमारी के तहत,
फ़िर उम्र ठंडी हो गयी और दास्तां उबल पड़ी l

ऐ जिन्दगी ! तेरी रक़ाबी टूटकर गिरने लगी,
कश्कोल जब हिम्मत की टूटी आके औंधे बल पड़ी l

उम्रभर का ये बशर खामोशियों में था मगर,
जब सीढ़ियां खतम हुईं, इक नज़्म सी मचल पड़ी l

मैं अब भी तेरा ज़िक्र हंसकर टाल देता हूं मगर,
तेरी कहानी क्या छुपे!, जब तक मेरी गज़ल पड़ी ll

word-meanings-

ख्वाब की ताबीर=सपने की सच्चाई
शम्म-ए-फुगन=आंसूओं की आग
कैफियत=समाचार/हाल-चाल
सोज़-ए-निहां=मन में छुपी तकलीफ़
हिज़रत=जुदाई
दौर-ए-खुमारी=जवानी के दिन
रक़ाबी=तश्तरी
कश्कोल=कटोरी

-Er Anand Sagar Pandey

7 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 03/08/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/08/2016
  3. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 04/08/2016

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