बन प्रेम-प्रसून -रामबली गुप्ता

दुर्मिल सवैया

बन प्रेम-प्रसून सुवासित हो,
उर में सबके नित वास करो।

मद-लोभ-अनीति-अधर्म तजो,
धर धर्म-ध्वजा नर-त्रास हरो।।

सत हेतु करो विषपान सदा,
मत किंचित हे! मनुपुत्र! डरो।

सदभाव-सुकर्म-सुजीवन का,
जग में प्रतिमान नवीन धरो।।

रचना-रामबली गुप्ता

प्रसून=पुष्प
त्रास=कष्ट
प्रतिमान=उदाहरण

शिल्प-आठ सगणों की आवृति,४-४ सगणों पर यति।
११२×८

20 Comments

  1. Dr Chhote Lal Singh Dr C L Singh 03/08/2016
    • रामबली गुप्ता 03/08/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/08/2016
    • रामबली गुप्ता 03/08/2016
  3. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 03/08/2016
    • रामबली गुप्ता 03/08/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 03/08/2016
    • रामबली गुप्ता 03/08/2016
  5. Kajalsoni 03/08/2016
  6. mani mani 03/08/2016
    • रामबली गुप्ता 03/08/2016
  7. ALKA ALKA 03/08/2016
    • रामबली गुप्ता 03/08/2016
    • रामबली गुप्ता 03/08/2016
    • रामबली गुप्ता 03/08/2016
  8. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/08/2016
    • रामबली गुप्ता 03/08/2016
  9. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 04/08/2016

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