कड़वा सच -क्यों करते ढोंग अभी भी क्यों हैं चैन अमन की उम्मीदें

फ्रांस, ब्रसेल्स, भारत, अमरीका, बांग्लादेश तथा अन्य देशों के शहरों के इस्लामिक आतंक के शिकार होने पर भी मौन दुनियाँ से आतंकियों के धर्म की पहचान और खात्मा करने का आह्वान करती मेरी ताजा रचना—

रचनाकार- कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
whatsapp- 9675426080

क्यों करते ढोंग, अभी भी क्यों हैं चैन अमन की उम्मीदें
पेरिस की देखी पीर मगर फ़िर भी ना खुल पाई दीदें

पूरी दुनियाँ में दशकों से कायम आतंकी दहशत है
हर एक कुरानी आयत में हमको तो दिखती वहशत है

कातिल हत्यारी दिखती हैं गजनी, बाबर की औलादें
मस्जिद ने और मदरसो ने सबको देदीं हैं फौलादें

अमरीका, मुम्बई और ब्रसेल्स में करते आए बर्बादी
हर रोज धमाके करते हैं बस एक धर्म के जेहादी

इंशा अल्लाह का नाम लिए खतरा-खतरा चिल्लाते हैं
ज्यादा हों तो सर पे चढ़ते कम हों तो पूँछ हिलाते हैं

हर मस्जिद में मौलवियों ने आतंकी अड्डा बना लिया
सबने इनको संरक्षण दे राहों में गड्ढा बना लिया

हर रोज नये फतवों में ये फ़रमान सुनाई देता है
पूरी दुनियाँ दहशत का अरमान सुनाई देता है

जितने भी काफिर हैं,उन पर,मिलकर ख़ंज़र से वार करो
माँ, बहनों को खाओ, नौचौ उनकी इज्जत को तार करो

जिसका खतरा टल जाता हो अबला के उजड़े चीरों से
कायम ना चैन अमन होता उस मज़हब की तकरीरों से

जिसने सारी ही दुनियाँ में मानवता का रथ रोका है
सच कहते हो तुम धर्म नहीँ वो धर्म नाम पर धोका है

सम्पूर्ण विश्व की जनता से अब आह्वान मैं करता हूँ
हर दया, धर्म वाले दिल में भी विष थोड़ा मैं भरता हूँ

कूकुर हो वफादार लेकिन वो भी तो धोका दे जाए
करता गद्दारी, चोर अगर बोटी का मौका दे जाए

इक दो अपवादों से ना पूरी कौम पाक हो जाएगी
अब जागो वरना ये जहान और जमीं खाक हो जाएगी

जितने नफ़रत के पैदाइश उन्हें बंदूकों से उड़वा दो
हर मस्जिद और मदरसो को जाकर तोपों से तुड़वा दो

आतंकवादियों से हथियारों की दुकान जो चला रहे
जो पहन सफेदी परदे पीछे काली दालें गला रहे

तलवार लिए तैयार खड़े जो हर काफिर की राहों पर
उन सबको एक-एक करके फाँसी देदो चौराहों पर

जो आतंकी की जननी है उस पुस्तक को भी राख करो
जो धर्म नाम पर बन बैठी वो धूमिल झूटी साख करो

ऐसा न किया तो सब बगदादी के गुलाम हो जाओगे
जब तक ढूंढोगे तुम कलाम, खुद ही सलाम हो जाओगे

ये “आग” कहे अब सारी दुनियाँ के दलाल आँखे खोलो
है धर्म कौन सा आतंकी थोड़ी हिम्मत करके बोलो

————कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”

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