‘फिर हंसा रहे हो!’_अरुण कुमार तिवारी

“फिर हंसा रहे हो,

फिर रुला देते हो|

भावो में मत घसीटो,

खुरच कर एक एक परत,

सम्वेदना और नफरत,

फिर भुला देते हो…

फिर हंसा रहे हो,

फिर रुला देते हो….”

लिए जाते हो दूर तलक,

उन्हीं ऊँचे पहाड़ों तक|

गढ़ने लगते हो बुलंदियां,

फिर उठा रहे हो!

फिर गिरा देते हो|

फिर हंसा रहे हो,

फिर रुला देते हो|

कभी कभी नींद से,

सपनो की उम्मीद में|

चाँद की तरुणाई से,

निशा की अरुणाई में|

फिर जगा रहे हो,

फिर सुला देते हो|

फिर हंसा रहे हो,

फिर रुला देते हो|

खुद बनाई खाई में,

वक्त की लड़ाई में|

मनगढ़त निकालते,

पर्वत भी राई में|

दूर जा रहे हो,

फिर बुला लेते हो|

फिर हंसा रहे हो,

फिर रुला देते हो|

फिर हंसा रहे हो….

-‘अरुण’

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15 Comments

  1. mani mani 02/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 02/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 02/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 02/08/2016
  2. Kajalsoni 02/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 02/08/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 02/08/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 02/08/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 02/08/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 02/08/2016
  6. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 03/08/2016

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