वेदना

सुन रहे हो न …
सुन रहे हो न
उस वैधव्य की
करूण पुकार
जिसका छूटा नहीं
अब तलक
मेंहदी का रंग
लेकिन
उजड़ गया सुहाग ।
देख रहे हो न
उदास बगिया
गमगीन चेहरा
और
बिलखता परिवार ।
क्या-क्या नहीं
स्वप्न देखा होगा
वो शख्स
समाज के लिए
परिवार के लिए
राष्ट्र के लिए ।
अरे !
बदलो
मत बढ़ाओ पाँव
उस रास्ते की ओर
जो ले जाना चाहती तुम्हें
गर्दिश राहों में !!!

8 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/08/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 01/08/2016
  3. mani mani 02/08/2016
  4. Kajalsoni 02/08/2016
  5. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 03/08/2016

Leave a Reply