धरती की आवाज

जंगल जंगल भटका मै चिड़ियों का कौतुहल सुनने
पंछी तो अब रहे नही किसका आशियां बनाऊँ मै
प्यासी धरती प्यासा है अम्बर हर जगह पानी की आस
नदियां तो अब सिकुड़ चुकी हैं फिर कैसे नीर बहाऊँ मै
वन-उपवन घूमकर देखा हर जानवर विलुप्त हो चले
सर्व-शक्तिशाली बन बैठा मानव किसका जीवन बचाऊँ मै
सुरंगें खुदी हैं चारों ओर रहने को जगह नही किसी छोर
जख्मों से तन छलनी मेरा कैसे बोझ उठाऊँ मै
इधर सड़क है उधर शहर है हर जगह पर घर ही घर हैं
जगह नही है खाली कोई कहाँ पर वन उपजाऊँ मै
न कोई सावन के गीत खो चुकी है नदियों का बहता संगीत
पत्थर दिल बन बैठे हैं मानव किसको गीत सुनाऊँ मैं

8 Comments

    • anoop mishra anoop 01/08/2016
  1. mani mani 01/08/2016
    • anoop mishra anoop mishra 08/08/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/08/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 01/08/2016
  4. C.M. Sharma babucm 01/08/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/08/2016

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