ईश वन्दना-दोहा छंद

ईश करूं नित वंदना, रहो सदा हिय-धाम।
कलुष-भेद उर-तम मिटा, सफल करो सब काम।।1।।

सदा वास उर में करो, करुणानिधि जगदीश।
करूं जोर कर वंदना, धरो कृपा-कर शीश।।2।।

पार करो भवसिंधु से, बन तरणी-पतवार।
तुम बिन कौन सहाय अब, हे! जग-पालनहार।।3।।

हरि! हर लो हर भेद-तम, द्वेष-दंभ-दुर्भाव।
उर में नित सत-स्नेह के, भर दो निर्मल भाव।।4।।

सूर्य-चंद्र-भू-व्योम-जल, अनल–अनिल तनु-श्यान।
सिंधु-शैल-सरि सृष्टि के, कण-कण में भगवान।।5।।

कृपा-सिंधु कर के कृपा, भक्ति-भाव दें दान।
छवि-पावन प्रभु! आपकी, रहे सदा मम ध्यान।।6।।

रचना-रामबली गुप्ता

व्योम=आकाश
कृपा-कर=दया का हाथ
सरि=नदी
तनु=पतला
श्यान=गाढ़ा

13 Comments

  1. mani mani 01/08/2016
    • रामबली गुप्ता 01/08/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/08/2016
    • रामबली गुप्ता 01/08/2016
    • रामबली गुप्ता 01/08/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/08/2016
    • रामबली गुप्ता 01/08/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 01/08/2016
    • रामबली गुप्ता 01/08/2016
  5. babucm babucm 01/08/2016
    • रामबली गुप्ता 01/08/2016
  6. Dr Chhote Lal Singh Dr C L Singh 03/08/2016

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