तेरी आत्मा

खुद ही खुद को ढूँढती हुई तेरी आत्मा हूँ मैं ,
दिन रात दबती ही रही वोह भावना हूँ मैं ,
बहुत रोका ,बहुत टोका ,बहुत दिल से निकाला भी ,
मगर आ आ कर बसती ही रही वह वेदना हूँ मैं।

सभी के सामने यह क्यूँ मुझे अंजान बताती हो ,
कि अपने आप को भी व्यर्थ में ही तुम सताती हो ,
हमेशा संग मेरे ही रही, क्यों मुँह छिपाती हो।

पहचानो ,कि तेरे भाग्य की विडंबना हूँ मैं ,
तेरी कल्पना ,तेरी कवि ह्रदय की प्रेरणा हूँ मैं
खुद ही खुद को ढूँढती हुई तेरी आत्मा हूँ मैं .

10 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 01/08/2016
    • Manjusha Manjusha 01/08/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/08/2016
    • Manjusha Manjusha 01/08/2016
  3. mani mani 01/08/2016
    • Manjusha Manjusha 01/08/2016
  4. Kajalsoni 01/08/2016
    • Manjusha Manjusha 01/08/2016
    • Manjusha Manjusha 01/08/2016

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