दाग – प्रियंका ‘अलका’

दर्पण -दर्पण देख रही थी
रूप-रंग के जटिल भेद को
खड़े -खड़े निर्रेद रही थी ।

अंदर -बाहर देख-देख
दृगे जब थोड़ी शांत हुई,
दर्पण पर फैले
असंख्य दागो को
देख -देख हृदय
फिर से हलकान हुई।।

स्त्री जीवन का कड़वा सच
यह दर्पण खड़ा दिखा रहा था,
बड़े हीं कटु वाणी में
मुझको वो बता रहा था,
तेरी बिंदी और
तेरे अलको के पानी
भी दाग-दाग मुझे
कर देते हैं,
लाख छुड़ाने पर भी नहीं मिटते
मैं चाँहू या
न चाँहू
मेरा हीं बन कर रहते हैं ।

तेरा दामन जैसे झीना है
मुझको भी टूट
कहाँ जुड़ना है ।।

जैसे मैं टूट-टूट बिखर जाता हूँ
दाग समेटे
सबकी पैरो से बचते
कूड़ेदान में डाल दिया जाता हूँ,
ठीक वैसे हीं-
तेरे लाख प्रयासों पर भी
तेरा झीना दामन
फट जाता है,
और दाग निगोड़ा
मिट न पाता है ।

पर हाँ-

तू मुझसे भी ज्यादा सहती है
तू दाग को जीती है। ।

टूट-टूट कर जीती है,
बिखर-बिखर कर जीती है,
खुद को खोकर जीती है,
शायद मर कर जीती है,
अजीब है… ..
पर जीती जरूर है ।

मेरा दाग तो
सबको दिखता है,
जब तक टूटता नहीं
तब तक धूल भी
झड़ता रहता है ।।

पर तेरा दाग……….

तेरे मन का दाग
तो शायद ईश्वर भी
नहीं देखा पाते
और तेरे तन के दाग
शायद दाग नहीं होते ।

सच हीं तो है –

स्त्रियों के लिए
दाग की कोई
परिभाषा नहीं होती,
बल्कि दाग स्त्रियों को
परिभाषित करते हैं ।।
पीड़ा हो चाहे
प्रेम हो
दाग-दाग तो सबसे पहले
स्त्री की आँचल हीं होती है।

अलका

14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/08/2016
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    • ALKA ALKA 01/08/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 01/08/2016
    • ALKA ALKA 01/08/2016
  3. C.M. Sharma babucm 01/08/2016
    • ALKA ALKA 01/08/2016
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  4. Kajalsoni 01/08/2016
    • ALKA ALKA 01/08/2016
  5. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 01/08/2016
    • ALKA ALKA 01/08/2016

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