रहस्य – प्रियंका ‘अलका’

खिड़की से बाहर झाँका तो
रात का अँधेरा
खिड़की के अंदर झाँक रहा था ।

कमरे की उजाले ने तो
उसका रस्ता रोक रखा था,
पर उर के तम ने उसको खींच
खुद मे ऐसा मिला लिया था
कि सिर्फ तम हीं तम
अब फैला था,
अंदर-बाहर
बाहर-अंदर
सब मैला
सब मैला था।।

सोच-समझ की बातो से परे
एक गूढ रहस्य
एक गहरा जख्म
अंदर हीं अंदर
बार-बार जो रिसता था
हर दर्द -दर्द
हर टिस- टिस
पल-पल उर को छीलता था ।

क्या कहना
क्या सुनना था
अंदर तो अब
दर्द हीं दर्द
बस अपना था।।

उजालो की परतो ने
दृगो को रस्ता खुब दिखाया
पर खुदाया,
मेरे उर के तम ने
बाहर के तम से
ऐसा हाथ मिलाया,
कि मिटना था
जिन यादों को
उन यादों ने
आज फिर मुझे
इस जिंदगी से दूर कर
उस जिंदगी से मात दिलाया ।

अलका

15 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/08/2016
    • ALKA ALKA 01/08/2016
      • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/08/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 01/08/2016
    • ALKA ALKA 01/08/2016
  3. C.M. Sharma babucm 01/08/2016
    • ALKA ALKA 01/08/2016
  4. mani mani 01/08/2016
    • ALKA ALKA 01/08/2016
    • ALKA ALKA 01/08/2016
  5. Kajalsoni 01/08/2016
    • ALKA ALKA 01/08/2016
  6. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 01/08/2016
    • ALKA ALKA 01/08/2016

Leave a Reply