‘फ़िर से……’_अरुण कुमार तिवारी

फिर से…
और फिर वो घड़ी आ गयी
फिर से…..

इस बार भी तुम्हारे जाने की, जल्दबाज़ी का वही अंदाज़,
वही बैग वही अल्फ़ाज|
वैसे ही मुश्कराना दोनों की नज़रों का झूठे,
दबाये पीड़ा दिखावे के नैन मोती टूटे,
तुम झूठे हो…
मेरा दुहराना मन में,
अश्रु की धार, एक लड़ी आ गयी,

फिर से….

दोनों के ही आँखों के गीले होते छोर,
वही ‘टिकट सम्हाल कर रख लो’
के रुंधे स्वर,
फिर से एक नए पाट के इस ओर,
बड़े हो रहे बच्चों से नज़र बचा कर रोना,
बिना स्वर बस सुबकना
हा ये संसार!
ये बिछडन और मिलन की डोर|
ये क्षुधा पूर्ती का तन्त्र,
अनिश्चित चलता ये सिलसिला

फिर से….

काश कोई कह देता डटकर
रुक जाओ!
अब न जाओ!
या लौट आओ!
काश!
मैं सोचती एकटक अपलक
निरखती तुम्हारा जाना
लौट आओ!
न जाओ!
मैं जल रही हूँ!
और फिर कैलेंडर पर लगा वही निशान
नापती दूरी मिलन की,
ये दूरी मिलन की!
‘क्यों कर हम मिले ?’सोचते ,
इस आरब्ध का अंत खोजते|
कब टूटे ये सिलसिला,
विक्षोभ का अंतिम सिरा|
क्या बंधा है साँसों की डोर से?
कि तोड़ दूँ इसे जोर से!
तोड़ दूँ अभी…

फिर से……

कभी सोचती कि काश,
तुम्हारे मिलने की कीमत पर
हो कोई अनहोनी
आन मिलो पास,
हा! ये निष्ठुर एहसास!
कि देखूं एक स्वप्न सुखान्त,
कर लूँ पार ये विरह मरु,
हो पल्लवित पुष्पित ये तरु|

फिर से……
फिर से…..

14 Comments

  1. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 31/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 31/07/2016
  2. mani mani 31/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 31/07/2016
  3. Kajalsoni 31/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 31/07/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 31/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 02/08/2016
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 31/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 02/08/2016
  6. sarvajit singh sarvajit singh 31/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 02/08/2016

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