एक ही चाहत

घड़ियाँ बीतीं, सदियाँ बीतीं
बीते जाते हैं सारे पल,
हर बीते पल कि बाजी पर
एक स्वप्न सँजोना चाहता हूँ |
वह नींद नहीं आती मुझको
जो नींद मैं सोना चाहता हूँ ||

समय चक्र कि सीमा नहीं
बदलाव जीवन का सत्य सही,
शक्तिहीन मैं, ना बदल पाऊँ
बस सोच बदलता जाता हूँ |
वह नींद नहीं आती मुझको
जो नींद मैं सोना चाहता हूँ ||

सत्य-यथार्थ से न नाता हो
निरर्थक जो जीना आता हो,
जो जीवन को दो पल और सहे
ऐसे सपनों में खोना चाहता हूँ |
वह नींद नहीं आती मुझको
जो नींद मैं सोना चाहता हूँ ||

रह न पाया उस छांव तले
वो शीतलता, वो वृक्ष घने,
भविष्य के उस आवाहन में
ऐसे बीज मैं बोना चाहता हूँ |
वह नींद नहीं आती मुझको
जो नींद मैं सोना चाहता हूँ ||
– प्रणव कुमार वर्मा

5 Comments

  1. babucm C.m.sharma(babbu) 31/07/2016
  2. pranavkv 31/07/2016
    • babucm C.m.sharma(babbu) 31/07/2016
  3. mani mani 31/07/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 31/07/2016

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