सोच

सोच
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मेरी सोच
बहुत बड़ी है

यह बनी है
अणु समान छोटे छोटे
अनंत बिंदुओं से

मेरी सोच के
हरेक बिंदु में
समा जाता है
अनंत ब्रह्मांड

मेरी सोच के
हरेक बिंदु से
निकल सकता है
अनंत ब्रह्मांड

मेरी सोच के
हर बिंदु में
समाई है सकल सृष्टि

मेरी सोच के
हर बिंदु में
समाया है परमेश्वर

मेरी सोच में
समाया है परमेश्वर
अपनी सृष्टि सहित,
पर मेरी सोच
परमेश्वर से बड़ी नहीं

मेरी सोच
बिंदु भर है परमेश्वर का

आप नास्तिक हैं
और परमेश्वर भी लापता है,
आपकी संपूर्ण सोच में

इसीलिए शायद
आप ठीक ही कहते हैं कि
आपकी सोच के
खुले आसमान में
मेरी सोच
एक पंछी की
उड़ान से अधिक नहीं

मुझे चाहे
बहुत बड़ी लगती हो
पर नि:संदेह
यह बहुत छोटी है
आपकी सोच के सामनेǃ
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—गुमनाम कवि (हिसार)
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2 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 30/07/2016
    • Gumnam Kavi 31/07/2016

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