ज़िंदगी को ज़िंदगी बना के

ज़िंदगी को ज़िंदगी बना के आज क्यों ये उलझन है
मेरी चाहत,मेरे रब के बिना चलती क्यों ये धड़कन है
राहें देखती है निगाहें,इंतज़ार में सूनी है आज भी ये बाहें
जाँ जाती नहीं,नींद आती नहीं कैसा इश्क का ये तड़पन है

2 Comments

  1. mani mani 29/07/2016
  2. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 29/07/2016

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