जिंदगी-I

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मैंने जिंदगी को रेलगाड़ी की तरह जाना।
जिसका प्रारम्भ जन्म और मृत्यु गंतव्य है।
मेरी इस यात्रा का मैं सारथी हूं।
कई लोग आये और गये।
कोई तत्काल ही चढ़ गया तो कोई बिना कुछ कहे उतर गया।
किसी की सीट आरक्षित तो कोई बिना टिकट सफर कर गया।
कभी मैं देर करता तो कभी उसे देर हो जाती।
इस प्रकार मुझसे वो और मैं उससे छूट गया।
शीतलेश थुल !!

12 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 29/07/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/07/2016
  2. mani mani 29/07/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/07/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/07/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/07/2016
  4. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/07/2016
  5. C.M. Sharma babucm 29/07/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 29/07/2016
  6. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/07/2016
    • शीतलेश थुल शीतलेश थुल 12/09/2016

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