रमि रमिता सों गहि चौगानं

रमि रमिता सों गहि चौगानं, काहे भूलत हो अभिमानं ।
धरन गगन बिच नहीं अंतरा, केवल मुक्ति भैदानं ।
अंतरि एक सो परचा हूवा, तब अनंत एक में समाया ।
अहरिण नाद नैं ब्यंद हथोड़ा,रवि ससि षालां पवनं ।
मूल चापि डिढ आसणि बैठा, तब मिटि गया आवागमन ।
सहज षलांण, पवन करि घोड़ा, लय लगाम चित चबका ।
चेतनि असवार ग्यान गुरु करि, और तजो सब ढबका ।
तिल कै नाके त्रिभवन सांध्या, कीया भाव विधाता ।
सो तौ फिरै आपण ही हूवा जाको ढूँढण जाता ।
आस्ति कहूँ ता कोई न पतीजै बिन आस्ति (अनंत सिध)क्यूँ सीधा ।
गोरष बोलै सुनौ मछिन्द्र हरै हीरा बीधा ।।

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