बेकसूर

हवाओं में आज एक हलचल है
जाने क्यों पत्तों में सरसराहट है
ये मौसम नहीँ अजीब आहट है
बात कुछ नहीँ लेकिन चाहत है;
फुटपाथ पर सोया मैं उठा नहीँ
रौंदा जिस्म जिसने दिखा नहीँ
जंगल मेरा घर था सड़क नहीँ
इन्सान ही था मैं जानवर नहीँ;
भावों को अपने बदल न पाया
खामोशी संग मेरा लहू बहाया
इंसानियत के तो दुश्मन सभी
तू मुझसे भी इश्क न कर पाया;
दर्द तो ज्ञानी भी न समझ पाये
लाचार भी हमको कह ना पाये
खुदकुशी में पहचान हुई वीरानी
ख़त्म करो अब न्याय की कहानी॥

……. कमल जोशी…….

7 Comments

    • K K JOSHI K K JOSHI 28/07/2016
  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 28/07/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 28/07/2016
  3. Kajalsoni 28/07/2016
  4. babucm C.m.sharma(babbu) 28/07/2016

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