गजल

नजर से बात करता हूँ,
नजारा बोल उठता है।

जमाने से बगावत मे,
किनारा बोल उठता है।।

अभी इस दौर में सबूतों पे,
चलने की आदत मत डालो।

पुराना राज भी अक्सर
चिट्ठी खोल उठता है।।

खुशी नोंटों से ना होती थीं,
बचपन मे हमें हरदम।

खनक सिक्कों की भी सुनकर,
बचकाना बोल उठता है।।

ऋषभ पाण्डेय राज

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/07/2016
    • डी. के. निवातिया rishabh 27/07/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 27/07/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप rishabh 27/07/2016

Leave a Reply