” एक अनजान मुसाफिर….”

” एक अनजान मुसाफिर….”

जिंदगी के राह पर कुछ यूँ मुकाम आ गया

लग रहा कोई पिछे रह गया…

ना जाने वो कहाँ खो गया..

वो पिछे चलता गया ,मे आगे चलता रहा…

ना जाने क्या हुआ उस वक़्त की बे रहेमी के कारण…

वो जान के भी अनजान बनता गया….

मे चलता रहा वो पीछे रहता गया…

मे चलता रहा..बस चलता रहा…

कुछ दफ़ा चलने के बाद सोचा वो भी साथ है…..

लेकिन कब किनारा आ गया.. पता ना चला कोई ना मिला….

मिला तो सिर्फ़…किनारा मिला…

ना जाने कीस तरह तूफान था वो जो बिना शोर मचाए ले गया उसको…

मे बस चलता गया…

रह गया मेरा हमसफ़र….

बस रहा तो एक मे अनजान मुसाफिर….

ओर एक किनारा रहा…

ना कोई अंजान रहा …

बस..यूँही मे चलता रहा….

यूँही मे चलता रहा..

-मयूर

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10 Comments

  1. Dr Chhote Lal Singh Dr C L Singh 26/07/2016
    • Mayur Sindha Mayur Sindha 27/07/2016
  2. mani mani 26/07/2016
    • Mayur Sindha Mayur Sindha 27/07/2016
  3. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 26/07/2016
    • Mayur Sindha Mayur Sindha 27/07/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/07/2016
    • Mayur Sindha Mayur Sindha 27/07/2016
  5. Kajalsoni 27/07/2016
    • Mayur Sindha Mayur Sindha 03/08/2016

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