अवधू गागर कंधे पांणीहारी, गवरी कन्धे नवरा

अवधू गागर कंधे पांणीहारी, गवरी कन्धे नवरा ।
घर का गुसाई कोतिग चाहे काहे न बन्धो जोरा ।
लूंण कहै अलूणा बाबू घृत कहै मैं रूषा ।
अनल कहै मैं प्यासा मूवा, अन्न कहै मैं भूखा ।
पावक कहै मैं जाडण मूवा, कपड़ा कहै मैं नागा ।
अनहद मृदंग बाजै तहाँ पांगुल नाचन लागा ।
आदिनाथ बिह्वलिया बाबा मछिन्द्रनाथ पूता ।
अभेद भेद भेदीले जोगी बद्न्त गोरष अवधूता ।।

Leave a Reply