गज़ल- मिलन की प्रथम रैन होगी सुधामय

वह्र-122 122 122 122

निशा-मध्य धीरे से घूँघट उठेगा।
सुघर रूप वधु का नयन में बसेगा।।

प्रतीक्षा हृदय जिसकी करता रहा है।
उसी रात्रि का इंदु हिय में खिलेगा।।

मुदित होंगे मन सुख के सपने सजेंगे।
अमित स्रोत सुख का उमड़ के बहेगा।।

छिपा आज तक था जो अव्यक्त हिय में।
बना प्रेम-सागर तरंगें भरेगा।।

नयन बंद होंगे अधर चुप रहेंगे।
मुखर मौन ही हाल हिय का कहेगा।।

खिला पुष्प-यौवन बिखेरेगा सौरभ।
भ्रमर पी अमिय मत्त आहें भरेगा।।

मिलन की प्रथम रैन होगी सुधामय।
अधर की छुवन से सकल तन खिलेगा।।

रचना-रामबली गुप्ता

हिय=हृदय
इंदु=चंद्रमा
अव्यक्त=जो कभी कहा न गया हो
सौरभ=सुगन्ध
भ्रमर=भँवरा
अमिय=अमृत, सुधा

10 Comments

    • रामबली गुप्ता 26/07/2016
  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 25/07/2016
    • रामबली गुप्ता 26/07/2016
  2. babucm babucm 25/07/2016
    • रामबली गुप्ता 26/07/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/07/2016
    • रामबली गुप्ता 26/07/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/07/2016
    • रामबली गुप्ता 26/07/2016

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