पहरेदार

सुबह होते एक-एक कर सारे निकल गए,
हंसरतों से घर बनाया पहरेदार बन गए,
जीवित हूँ या रूह ये फर्क नहीं मिलता,
घर के सन्नाटे में रह जख्मों को सिलता,
मौन बैठे-बैठे यूँहीं यादों ने जकड लिया,
कब आँख लगी, कब बिस्तर पकड़ लिया,
दस्तक हुई तो मन आहट पर तेजी से दौड़ा,
कदम लाठी संग घिसटता ही गया थोड़ा,
द्वार खुलते ही सबसे शिकायतें ही मिलीं,
रात भर जागते हैं दिन में नींद ही न खुली,
किसी ने न समझा बुढ़ापे के इस दर्द को,
हर मौसम में पकड़ रही अब इस सर्द को ।

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com
Note : ब्लॉग पर तस्वीर के साथ देखें.

22 Comments

  1. Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 25/07/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 25/07/2016
  3. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 25/07/2016
  4. रामबली गुप्ता 25/07/2016
  5. mani mani 25/07/2016
  6. C.M. Sharma babucm 25/07/2016
  7. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/07/2016
  8. sarvajit singh sarvajit singh 25/07/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 26/07/2016
  9. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/07/2016

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