मत्तगयन्द सवैया

सुंदर पुष्प सजा तन-कंचन
केश -घटा बिखराय चली है।

अंजित नैन कटार बने
अधरों पर लाल लुभाय चली है।।

अंगहि चंदन गंध भरे
मद-मत्त गयंद लजाय चली है।

हाय! गयो हिय मोर सखे!
कटि जूँ गगरी छलकाय चली है।।

रचना-रामबली गुप्ता

गयंद=हाथी
कटि=कमर
अंजित=काजल लगे हुए

11 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/07/2016
    • रामबली गुप्ता 25/07/2016
  2. babucm babucm 25/07/2016
    • रामबली गुप्ता 25/07/2016
  3. Kajalsoni 25/07/2016
    • रामबली गुप्ता 25/07/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 25/07/2016
    • रामबली गुप्ता 25/07/2016
    • रामबली गुप्ता 25/07/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/07/2016

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