जो दे गए थे रुसवाई वो बात पलटने आए हैं

जो दे गए थे रुसवाई वो बात पलटने आए हैं

है अफ़सोस लिखा रुख पर नैनों में आँसू लाए हैं

 

जिनके कारण छोड़ा हमने महफ़िल को दरबारों को

आज वही फिर माफ़ी दे दो ये संदेस सुनाए हैं

 

ऐसे में क्या कीजे कुछ मालूम नहीं पड़ता दिल को

इन अंदाज़ों से वो हमको पहले भी भरमाए हैं

 

लफ़्ज़ों में कितनी सच्चाई और कितना है झूठ भरा

समझ नहीं आता वो सच में रोए या मुस्काए हैं

 

ख़लिश पता है हमको उनकी फ़ितरत तोता-चश्मी है

फिर भी कैसे ना कह दें जब वो खुद दर पर आए हैं.

 

रुख = चेहरा

 

महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

१५ मार्च २०१२

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