ज़िन्दगी जीता रहा_अरुण कुमार तिवारी

ना लिखा कुछ ना कहा
पलक थामें निरखते
बस ज़िन्दगी जीता रहा
ना लिखा कुछ….

हाशिये पे रख हकीकत
बेखबर बेज़ार बन,
उठ रहा नित बन धुंआ सा
राह की नीयत विषम,
कुछ कहा कुछ ना कहा,
जो भी कहा बस नज़र से,
दर्द के हाले सजाये,
बेवजह पीता रहा..

ना लिखा कुछ ना कहा..

था मगर अफ़सोस,
साँसे घट रही थी ज़िन्दगी|
झाँकती दीवार से ,
मुश्का रही थी बेबसी|
हास का उपवास निर्जल,
द्वन्द घिरते जलद से।
हरीतिमा हरते हरषते,
नेह से रीता रहा|

ना लिखा कुछ ना कहा….

रात बीती कालिमा ,
था चन्द्र लोपित धुंध से|
छँट चली वो हठित बदली,
स्वाति की एक बूँद से|
मन फिरे चातक बना सा,
क्या प्रश्न करता चन्द्र से|
भाव की गुदड़ी जुटाए,
खोलता सीता रहा।

ना लिखा कुछ ना कहा,
पलक थामे निरखते बस
ज़िन्दगी जीता रहा।
ना लिखा कुछ……

-‘अरुण’
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13 Comments

  1. sarvajit singh sarvajit singh 21/07/2016
  2. babucm C.m.sharma(babbu) 22/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 22/07/2016
  3. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 22/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 22/07/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/07/2016
  5. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 22/07/2016
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 22/07/2016
  7. mani mani 22/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 22/07/2016
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 22/07/2016

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