बिन मंजिल का राही

बिन मंजिल का राही
************************
पता नहीं कौन था वह
जो चला जा रहा था
मुझसे आगे आगे
बिना सोचे
बिना विचारे
बिना देखे
आगे पीछे
दायें बायें

चला जा रहा था वह
अपनी ही धुन में
उस अंतहीन खतरनाक रास्ते पर
जो नहीं जाता किसी मंजिल तक

वह कौन था
अंततः एक दिन
खुल गया उसका राज
मालूम तब हुआ
जब निकले
मेरे शरीर से प्राण और
उसको गिरते देखा मैंने ǃ

************************
—गुमनाम कवि (हिसार)
************************

8 Comments

  1. Kajalsoni 21/07/2016
    • Gumnam Kavi 21/07/2016
  2. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 21/07/2016
    • Gumnam Kavi 22/07/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/07/2016
    • Gumnam Kavi 22/07/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/07/2016
    • Gumnam Kavi 25/07/2016

Leave a Reply