आशियाँ

आशियाँ
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गुज़रे वक़्त में
बहुत आँधियाँ चली थी

आँधियों में उड़कर
मेरे पास आ गये थे
कितने ही तिनके

न चाहते हुए भी
बन गया था मुझसे
छोटा सा इक आशियाँ

बना ही था आशियाँ
कि फिर चली आँधियाँ
साथ उड़ा ले गई
तिनकों से बना आशियाँ

शेष रह गया है
बिन तिनकों का आशियाँ

क्यों चली थी आँधियाँ ॽ

आँधियों को
क्यों नहीं दिखता
यह ‘सूक्ष्म’ आशियाँǃ
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—गुमनाम कवि (हिसार)
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2 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/07/2016
    • Gumnam Kavi 22/07/2016

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