ठेले पर

ठेले पर ठेलती है जिंदगी
हँसती मुस्कराती
ढकेलती है जिन्दगी .

कदर उनकी कौन
समझता है यहाँ
पेट पर सब पाँव
रखता है यहाँ .
हर तरफ़ से मार
झेलती है जिन्दगी
ठेले पर ………

दृष्टि में खूबी नहीँ
पहचान की
चूसता है आदमी
रक्त इंसान की
हर दिन ख़तरों से
खेलती है जिन्दगी
ठेले पर ……….

दाल रोटी के लिये
लाले पड़े हैं
निकला जब भी घर से
तो छाले पड़े हैं
टूटे हुए चौके पर
बेलती है जिन्दगी
ठेले पर ……….

जायें तो जायें किधर
ये बड़ा सवाल है
मददगार भी नहीँ
इस बात का मलाल है
कैसे फटेहाल रेलम
रेलती है जिंदगी
ठेले पर
ठेलती है जिन्दगी
हँसती मुस्कराती
ढकेलती है जिन्दगी
ठेले पर !k
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