भोको की माँ

पेड़-लत्ताओं की
कच्ची हरी पत्ती
सफेद होकर गिरे जाती है
फिर से नयी हरियाली
पेड़ों में छा जाती हैं

सूर्य की प्रकोप से सुखी
बुढ़ी धरती भी
वर्षा की बूँदों से
हरे हो जाती हैं फिर से

नदि-नाले भी
हमेशा एक जैसी
नहीं रहती
वक्त के साथ
अपना पथ बदलती है

लोग भी तो कहते हैं
कि यह सृष्टि भी
परिवर्तनशील हैं

खड़िया टोला
गन्दी बस्ती में रहनेवाली
भोको की माँ
पूछ रही हैं
क्यों नहीं बदल रही है
मेरी हालत?
क्या मैं इस सृष्टि का
अंग नहीं हूँ?

7 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 20/07/2016
    • chandramohan kisku chandramohan kisku 20/07/2016
    • chandramohan kisku chandramohan kisku 20/07/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 20/07/2016
  3. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 20/07/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/07/2016

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