दिल मे तुम बस गई

दिल मे तुम बस गई स्वाँस मे रच गई
पर नजर के लिये तुम पराई रही ।

गीत तुम बन गई तुमको गाता रहा
बाँसुरी तुम बनी मैं बजाता रहा ।
स्वाँस के तार पर तुम थिरकने लगी
वाणियों में मगर ना सुनाई पड़ी ।।

दिल के तारों को तुमने तो झंकृत किया
रुप को तुमने मेरे अलंकृत किया ।
मन के आँगन को खुशबू से महका दिया
सदियों तक जो न मन से भुलाई गई ।।

साथ हर पल रही दूर रह कर भी तुम
सब कुछ कह गई मौन रह कर भी तुम
इस जहाँ से परे तुम कहाँ बस गई
चाह कर भी न मुझसे बुलाई गई ।।

बातों – बातों में ही तुम तो रुठ गई
प्यार के रिश्ते की ड़ोरी टूट गई
आस फिर भी कभी मैने छोड़ी नहीं
तुम ही रुठी कि फिर ना मनाई गई ।।

राज कुमार गुप्ता – “राज“

14 Comments

    • RAJ KUMAR GUPTA RAJ KUMAR GUPTA 22/07/2016
  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 19/07/2016
    • RAJ KUMAR GUPTA RAJ KUMAR GUPTA 22/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 19/07/2016
    • RAJ KUMAR GUPTA RAJ KUMAR GUPTA 22/07/2016
  3. C.M. Sharma babucm 19/07/2016
    • RAJ KUMAR GUPTA RAJ KUMAR GUPTA 22/07/2016
  4. mani mani 19/07/2016
    • RAJ KUMAR GUPTA RAJ KUMAR GUPTA 22/07/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 19/07/2016
    • RAJ KUMAR GUPTA RAJ KUMAR GUPTA 22/07/2016
  6. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 19/07/2016
  7. RAJ KUMAR GUPTA RAJ KUMAR GUPTA 22/07/2016

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