गुरू पूर्णिमा

गुरु है एक ज्ञान का कुंआ
और शिष्य ज्ञान का प्यासा,
अपनी ज्ञानता से गुरु शिष्य की,
ज्ञान- पिपासा को है मिटाता।
गुरु है एक कुम्हार,
और शिष्य कच्चा घड़ा है मिट्टी का,
गुरु अपनी शिक्षा से,
शिष्य का पूर्ण विकास है करता,
और उसे परिपक्व बनाता,
गुरु है एक मार्गदर्शक,
और शिष्य भटका हुआ एक राही,
अपने उच्च मार्गदर्शन से,
शिष्य को सही राह दिखलाता,
गुरु एक पतवार है,
और शिष्य एक नैय्या,
सही दिशा का ज्ञान कराकर,
अपने शिष्य को वो,
भव सागर से पार कराता,
इसलिए ईश्वर से पहले,
गुरु का नाम लिया है जाता,
क्योंकि गुरु कृपा से ही,
शिष्य ईश्वर के वास्तविक,
रूप का दर्शन है पाता।
By:Dr Swati Gupta

16 Comments

    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 19/07/2016
    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 19/07/2016
  1. babucm babucm 19/07/2016
    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 19/07/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 19/07/2016
    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 19/07/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 19/07/2016
    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 19/07/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 19/07/2016
    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 19/07/2016
  5. Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 19/07/2016
    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 20/07/2016
  6. mani mani 19/07/2016
    • Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 20/07/2016

Leave a Reply