मिल संग लड़ संग्राम !

तज निजता का अभिमान,
मिल संग लड़ संग्राम !

अब बहुत हुआ नृशंस खेल, नहीं अनन्त ये,
चल थाम मिल, न बढे, कर अब तमाम,
है निरीह मानव का क्रन्दन, नहीं नियति ये,
मरहम लगा अब, न रुक, कर अश्रु थाम,
नियत कर मिल शक्ति से, मरें न निरीह ये,
श्रेष्ठता मिट रही, निज का तू कर सम्मान ।

तज निजता का अभिमान,
मिल संग लड़ संग्राम !

कर द्वार बंद अब, जाते जो राह दानव दल के,
तोड़ क्रूर अभिमान, जो दम्भ क्षण-क्षण भर रहे,
बालमन से कलम छीन, क्रूरता का बीज डाल,
इंसानियत को शर्मशार कर, क्रूरता दिखा रहे,
मजहब की ओट ले आस्थाओं को छल-छल कर,
मन मस्तिष्क को वश कर, धन से तौल रहे ।

तज निजता का अभिमान,
मिल संग लड़ संग्राम !

कर संगठित उन्हें हैं दूत जो बिखरे हुए सब गुप्त,
न रहे संकोच किसी बात का पर रहे लक्ष्य अचूक,
कर ज्ञान के वो द्वार बंद, जो मन का विष बोते,
बालमन को ऐसे निखार, न थामे स्वयं बन्दूक,
अब हो प्रहार का अंत, पहुँच रहे हर शाखा तक,
न बचे बीज, न रहे मन विष, रहे न कोई चूक ।

तज निजता का अभिमान,
मिल संग लड़ संग्राम !

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com
Note : ब्लॉग पर तस्वीर के साथ देखें.

16 Comments

  1. mani mani 18/07/2016
  2. Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 18/07/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/07/2016
  4. babucm babucm 18/07/2016
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/07/2016
  6. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/07/2016
  7. sarvajit singh sarvajit singh 18/07/2016

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