लफ्ज़ो की किताब……….मनिंदर सिंह “मनी”

निकल पड़ा, लिए लफ्ज़ो की किताब,
जिंदगी के हर दौर का था हिसाब,
कुछ पन्नो पर मुस्कुराता शैशव काल,
कुछ पन्नो पर जवानी के संघर्ष का हिलाव,
टूटती कल्पनाओं का उमड़ा सैलाब,
ना चाहते बेचने निकल पड़ा अलफ़ाज़,
सहेज रखा था, वाह वाह का ख़िताब,
सोचा कुछ तो मिलेगा, बेच जज्बात,
भीनी-भीनी खुशबू वाला ईश्वर का अनुराग,
माँ-पिता का औलाद के लिया किया त्याग,
लिखी तहे दिल, देश भक्ति वाली बात,
उकेर दिया पहली नज़र के प्यार का प्रस्ताव,
सहसा क़यामत बन गुजरा लोगो का मजाक,
जैसे बलात्कार कर दिया मेरे साथ,
वो हस रहे मुझपर, जैसे पी हो मैंने शराब,
पूछ रहे कहाँ से चुरा लिख लाए किताब ?,
कहाँ लिख्वायु शिकायत ? कौन करेगा विश्वाश ?
प्रतिलिपि ने कर दिए बद से बदत्तर हालात,
झलक रही, बच्चों के चेहरों पर भूख प्यास,
देख मेरी बेबसी, मुखोटा पहन लिया मन्दहास,
रोया बहुत मैँ तन्हा हो उस रात,
सोच जाने कौन लगा गया घात ?
प्रतिलिप की मार से तड़प रहा, हर इंसान,
चाहे लेखक, वैध, अभियंता या हो किसान,
निकल पड़ा “मनी”, लिए लफ्ज़ो की किताब,

16 Comments

  1. babucm babucm 18/07/2016
  2. mani mani 18/07/2016
  3. Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 18/07/2016
  4. mani mani 18/07/2016
    • mani mani 18/07/2016
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/07/2016
    • mani mani 18/07/2016
  6. mani mani 18/07/2016
  7. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/07/2016
  8. mani mani 18/07/2016
  9. sarvajit singh sarvajit singh 18/07/2016
    • mani mani 19/07/2016
  10. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 18/07/2016
    • mani mani 19/07/2016

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