रुपैया की आत्मकथा – अनु महेश्वरी

हु मैं रुपैया कहने को ताकतवर,
पर चलता मैं औरो की मर्ज़ी पर|

रूप अनेको मेरे,
कभी बन जाता काला,
कभी बन जाता सफ़ेद|

वजह भी बनता मैं ही,
कभी बाल मजदूरी की,
अभिमान या निराशा की|

नाम अनेको मेरे,
कभी रिश्वत,
कभी तनख्वाह,
कभी दान,
कभी दक्षिना,
कभी फीस,
कभी पेंशन|

बिन मेरे कोई न होता काम,
हु मैं झगड़े की जड़ भी,
आए दूरियां रिश्तो में भी|
पर दोषी मैं नहीं,
मेरा मुझपे अधिकार नहीं,
कभी कहा किसी ने सुनी मेरी|

कोई मुझे तीजोरी में रखते,
कोई बैंक के खाते में,
न कोई मुझे पूछता,
मैं कैसे खर्च होना चाहता,
कभी कहा किसी ने सुनी मेरी|

ड्रग्स और मदिरा में मुझे उड़ाते,
हॉस्पिटल भी पहुंच जाते,
फ़िर इलाज में,
मैं ही काम आता,
पर कहाँ सुधरते लोग,
कही फ़िज़ूल का बहा रहे,
शादियों पे दिखावा कर|

पर मेरी आत्मा तब मर जाती,
जब किसी बेटी को,
दहेज़ की बेदी पर,
भेट चढ़ते देखता,
तब मैं सोचता,
काश मैं रूपया ना हो,
कागज़ ही रह पाता|

“अनु माहेश्वरी ”
चेन्नई

10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/07/2016
    • ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 31/07/2016
  2. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 31/07/2016
    • ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 31/07/2016
  3. Kajalsoni 31/07/2016
  4. ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 31/07/2016
  5. mani mani 31/07/2016
    • ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 31/07/2016
  6. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 31/07/2016
    • ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 31/07/2016

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