सैलाब

बड़ी-बड़ी बूंदें बारिश की, बादल भी है फट रहे ।
कट रहा नदिया किनारा, घर-द्वार सब बह रहे ।
अचानक उठा सैलाब पलक झपकते निगल गया,
अभी खड़े पिकनिक मनाते अब अचानक बह रहे ।
ढह गए पर्वत, रहा न बचा अब उनका शिखर,
जो कभी झुकते नहीं थे, आज वो ही मिट रहे ।
पुल टूटे, सड़कें भी बह गईं, बची नहीं कोई राह,
जलमग्न हुआ शहर-गाँव, विपदा सब सह रहे ।
बुनियाद सफलता की रख, गर्व किया करते थे,
हश्र सफलता का देख, उन्हीं के आंसू बह रहे ।

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com
Note : ब्लॉग पर तस्वीर के साथ देखें.

16 Comments

  1. mani mani 16/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/07/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/07/2016
  4. Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 16/07/2016
  5. C.M. Sharma babucm 16/07/2016
  6. sarvajit singh sarvajit singh 16/07/2016
  7. kiran kapur gulati Kiran Kapur Gulati 17/07/2016

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