क्यूँ दर्द की हर दास्तां रंगीन लगाती है…

वक़्त कैसा आ गया है, इस सफर में देखिये…
जिंदगी हर मौत की शौकीन लगती है…
तूने बनाई थी बड़ी हमदर्द ये दुनिया…
संगदिल ये क्यूँ मुझे संगीन लगती है…

आंसुओ का हर तरफ़ सैलाब उमड़ा है…
दिल मगर बंजर कहाँ तक पीर भरती है…
मेरी पलकों पर लदा हर बोझ कड़वा है…
गैर पलकों की नमीं नमकीन लगती है…

दर्द से बेबस भले तिल-तिल तड़पता हो…
हर तमाशे पे यहाँ पर भीड़ लगती है…
और गलियों में मोहल्लों में वही चर्चा…
क्यूँ दर्द की हर दास्तां रंगीन लगाती है…

– सोनित

9 Comments

  1. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 16/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/07/2016
  3. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 16/07/2016
  4. mani mani 16/07/2016
  5. sarvajit singh sarvajit singh 16/07/2016
  6. C.M. Sharma babucm 16/07/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 16/07/2016

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