कही चोरी, कही खुदखुशी………….मनिंदर सिंह “मनी”

अर्द्धनगन सी, प्यारी नन्ही मुस्कान को,
दो निवाले खातिर, चोर बनते देखा मैंने,
झट लिपट मुझसे, सिर्फ इशारों से,
भूख से बदहवास हुई को, मिन्नतें करते देखा मैंने,
जाने बिना वजह, खा जाने वाली नज़र को,
कब से पड़े मुर्दो में जिन्दा होते देखा मैंने,
हवाले कर दो हमारे, इसने चोरी की है,
चोरो को सरे बाजार, पाक होते देखा मैंने,
मारो नज़र पहले अपने अंदर, हर किसी को,
खुद की आँखों में शर्मिंदे होते देखा मैंने,
कसकर लिपट गयी मुझसे, गालो पर दे चुम्बन,
बेजुबान को तहे दिल शुक्रिया करते देखा मैंने,
ले गयी घर मुझे अपने, एक माँ बीमारी से,
एक बाप को पैसे की लाचारी से लड़ते देखा मैंने,
कालाबाज़ारी, रिश्वतखोरी, बेईमानी के साये में,
सच्चे श्रम को, कही चोरी, कही खुदखुशी करते देखा मैंने,

8 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 14/07/2016
    • mani mani 14/07/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/07/2016
  3. mani mani 14/07/2016
    • mani mani 14/07/2016
  4. sarvajit singh sarvajit singh 14/07/2016
    • mani mani 15/07/2016

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