है तुम्हारा मेल बहुत

कांच को हीरा. समझती रही
पथरों से ही झोली भर्ती रही
उलझ दुनिआ के रंगों में
डूबती रही उभरती रही
दामन में मोती डाले तूने
मोल समझ न पाई मैं
मुड़ कर जो देखा आज
सोच अपनी पे शरमाई मैं
पा जाने को सच्ची ख़ुशी
क्या क्या स्वांग रचते रहे
पूरा उनको करने. को
एड्डी चोटी भी एक करते रहे
ढून्ढ. ढून्ढ जब थक गए
पल भर को हम रुक गए
किसी सोच में पड गए
जाने कैसी ललक है लगी हुयी
ज़िन्दगी कश्म काश में फंसी हुयी
क्षणभंगुर. हैं सुख ये सारे
फिरते क्यों हम मारे मारे
फर्क है तो बस नज़र का
बाहर तो हैं दुनिआ के मेले
अंतर में हम खुदसे खेलें
इस लुका छुप्पी. के खेल में
कभी खुद को खो दें
कभी उसको पालें
प्यारा है यह खेल बहुत
न चाहिए कुछ और
हो तुम काफी
और तुम्हारा मेल बहुत

8 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/07/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 13/07/2016
  2. babucm babucm 13/07/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 13/07/2016
  3. mani mani 13/07/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 13/07/2016
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 13/07/2016

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