वर्तमान परिवेश में रिश्ते

रिश्तों का अर्थ बदल रहा
प्रीत नफरत में उबल रहा
वाचाल बना हर कोई यहाँ
अपनों को बस कुचल रहा

कभी प्रीत की भाषा थी मौन
आज बिन बोले समझे कौन
हर रिश्ता लगता जीर्ण शीर्ण
चेतन नवांकुर करेगा कौन

रिश्तों की ये अजीब उलझन
मर्यादा खंडित होती हर क्षण
स्वछन्द रहने की जिजीविषा में
रिश्ते शर्तों के क्षणिक गठबंधन

आज जिसके लिए रखा उपवास
कल उसी दिल में दूजे का वास
वसन बदलते है बदन के जैसे
रोज बदलते यहाँ खासम-खास

आगे निकलने की लगी होड़
कर्तव्यों ने भी लिया मुँह मोड़
निकल जाते है लोग यहाँ
घरों में पड़े लाशों को छोड़

निज पडोसी दीखते अंजाने से
कभी साथ आते थे मयखाने से
अब तो अपने ही शक करते है
यारों के दर भी आने जाने से
!!!!
!!!!
सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”

15 Comments

  1. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 13/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/07/2016
  2. C.M. Sharma babucm 13/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/07/2016
  3. mani mani 13/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/07/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 14/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/07/2016
  5. sarvajit singh sarvajit singh 14/07/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 14/07/2016

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