चांद..

कल फिर गया था मैं घर की छत पर
उस चांद को देखने
इस उम्मीद में की शायद
तुम भी उस पल उसे ही निहार रही होंगी
देख रही होंगी उसपर बने दाग के उस भाग को
जिसे मैं देख रहा था..
आखिर..
प्यार भी अजीब हैना..
मिलने के कैसे-कैसे बहाने ढूंढ लेता है..

-सोनित

6 Comments

  1. chandramohan kisku chandramohan kisku 11/07/2016
  2. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 11/07/2016
  3. C.M. Sharma babucm 11/07/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/07/2016
  5. Rinki Raut Rinki Raut 11/07/2016

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