आईना : एक पिता के अहसास

आईने में देखकर मैं खुदको पहचान ना सका
मैं कौन हूँ कैसे हूँ यहाँ जान ना सका
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अब अपने तजुर्बे पे मुझको गुमान था नहीं
चुप रह के बैठने में नुकसान था नहीं
जिनको सिखाया मैंने बोलने का तरीका
अब उनसे बहस करना आसान था नहीं
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शरीर निष्क्रिय हो भले पर मन अभी सक्रिय है
भुजाओ में शक्ति नहीं पर मन अभी क्षत्रिय है
तूफानों को मोड़ देने वाली हिम्मत आज भी है
असहाय की सहायता करने की हसरत आज भी है
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पर अपने ही खून की फब्तियां सुनने की ताकत है नहीं
भले अब मौत आजाये मुझे जीने की चाहत है नहीं

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6 Comments

  1. babucm C.m.sharma(babbu) 11/07/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/07/2016
  3. mani mani 11/07/2016

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