॥ अन्तर मन्थन ॥

जिन्दगी 2
आज मेरे परिवार में छाया, इक अदभुत आनंद |
सब मिल मना रहे दीवाली, प्रेम का छाया है नव रंग ||
इक समय वह भी था, जब उदासी ने मुझको घेरा था |
नैराश्य की छाया घेरे थी, चारों ओर अँधेरा था ||
कल की ही है बात, जब मैं बुरी तरह से टूटी थी |
मेरे कर्मों की गठरी, मेरे ही सर पर फूटी थी ||
मैं थी अकेली जीवन पथ पर, प्रतिपल होता था मुझको भान ।
कर्म फल का नियम, कदापि ना दे सकता किसी को क्षमा दान ॥ 1 ॥
वृद्धावस्था ने था जकड़ा , बहुतों ने साथ था छोड़ दिया ।
शुभेच्छुओं ने भी शनै: शनै:, मैत्री का नाता था तोड़ दिया ॥ 2 ॥
जिनके लिए लड़ी थी जीवन भर, सबने साथ था छोड़ दिया ।
जीवन पथ पर रही अकेली , सबने था मुख मोड़ लिया ॥ 3 ॥
दीवार पर टंगी हुई थी , स्वर्गीय पति की तस्बीर ।
बीते पलों की थी याद दिलाती, क्षण क्षण करती थी मुझे अधीर ॥ 4 ॥
बेटी थी हो गयी पराई , बेटे गृहस्थी में थे मगन हुए ।
बुढ़ापे का एकमात्र भी था साथी छोड़ चला, सम्बन्ध सभी से थे खत्म हुए ॥ 5 ॥
एकांत काल भी है इक साथी , करता जो विचारों का मंथन ।
मंथन से ज्ञान प्रकट होता, जिससे बनता है निर्मल मन ॥ 6 ॥
बेटे बेटी के वाक युद्ध ने, मुझे भीतर तक था तोड़ दिया ।
रिश्तों में पडी दरारों ने था , अंतर तक झकझोर दिया ॥ 7 ॥
बेटा बोला था बेटी से , तुमसे सम्बन्ध समाप्त हुआ ।
मैं मरा तुम्हारे लिए आज से , सारे रिश्तों का नाश हुआ ॥ 8 ॥
तुम सी बहन के कारण ही , द्धेष हमारे बढ़ते हैं |
जब भी तुम आकर जाती हो, सम्बन्ध हमारे बिगड़ते हैं ॥ 9 ॥
बहू थी बोली बेटी से, मुझको परिवार का धर्म सिखाती हो |
सास ससुर संग किया जो तुमने, भूल उसे क्यूँ जाती हो ॥ 10 ॥
बेटी भी कम ना थी बोली , मैंने भी तुमको छोड़ दिया |
मैं हुई बिना भाई के, अब से नाता मैंने तोड़ दिया ॥ 11 ॥
मै मर भी जाऊँ तब भी तुम, रोने के लिए नहीं आना |
वास्ता नहीं रहा तुमसे, मेरे मरने पर मुस्काना ॥ 12 ॥
जाते-जाते बेटी बोली, तुमने क्या नया काम किया |
बीते इतिहास को दुहराया , स्वर्गीय पिता को नव नाम दिया ॥ 13 ॥
बहन बेटियों तो इस घर से, सदा निकाली जाती हैं |
ससुराल की चौखट पूज-पूज कर , खुशियां घर में लाई जाती हैं ॥ 14 ॥
बेटी रोकर चली गयी, कर मुझको अंतिम प्रणाम |
बोली मम्मी ना आऊँगी अब , रखना बेटे-बहू को थाम ॥ 15 ॥
जैसे अपनी ससुराल हो भूली , वैसे ही मुझे भुला देना |
मेरी याद आने पर, मामा-मौसी को बुला लेना ॥ 16 ॥
पापा को नित कोस-कोस कर , चाचा-बुआ को छुड़ा दिया ।
ससुराल छुड़ा कर तुमने अपना , संबंधों को इतिहास बना दिया ॥ 17 ॥
भाई बहन के वाकयुद्ध को, सुना था मैंने बनकर मूक |
आँसू ना निकले थे आंखों से , उठी थी अंतर में शूल सरीखी हूक ॥ 18 ॥
जीवन साथी की फोटो के सम्मुख , रोने के सिवा बचा था क्या |
आँखों में. नमी झलकती थी, अकेलेपन के सिवा रखा था क्या ॥ 19 ॥
बेटे की ससुराल से आने वाले थे, कुछ खास किस्म के मेहमान |
बहू पोते-पोती बेटे, मगन हुए करने को सम्मान ॥ 20 ॥
बेटी के घर से जाते ही, मेहमानों ने था घर में कदम रखा |
ठहाकों से घर था गूँज उठा, पर मैंने मौन व्रत था ज्यों रखा ॥ 21 ॥
दरवाजा भीतर से था बंद हुआ, बेटे थे लगे मनाने आनन्द |
पर मेरे मन में मचा हुआ था , भीतर ही एक अंतर्द्धन्द ॥ 22 ॥
अकेलापन बांटने को, मैं चली थी दूर कुछ करने सैर |
पर मेरी मनोव्यथा मानो, रखे थी मुझसे प्रबल बैर ॥ 23 ॥
सैर नहीं कर पाई थी , मेरे उद्धेलित मन को शांत |
विचारों की श्रंखला नाच-नाच करती थी, मुझे और उद्भ्रान्त ॥ 24 ॥
केवल व्यस्तता ही ना कर सकती , मानव की चिंता दूर |
सत्य का सामना किए बिना , शांति ना मिल सकती भरपूर ॥ 25 ॥
एकमात्र सहारा ईश्वर का , शायद वहीं मिलेगी शांति |
मन्दिर की ओर थे बढे कदम, करने को दूर मन की भ्रान्ति ॥ 26 ॥
ईश्वर को था किया समपर्ण, अश्रुधार थी बह निकली |
यह क्या किया विधाता तूने , आज न मेरी एक चली ॥ 27 ॥
रो-रो कर मन की व्यथा कही थी , अन्तर्यामी के समक्ष |
अंतर से ही था आदेश मिला, रोने से पहले मन को करो स्वच्छ ॥ 28 ॥
तुम रोती हो किसी के कारण, तुम्हारे कारण भी कोई रोता है |
जग में अकारण कुछ भी नहीं , हर बात का कारण होता है ॥ 29 ॥
औरों को दोषी ठहराकर , मानव दोष न खुद का छिपा सकता |
दुनिया को शांत करा कर मानव , भूल न खुद की छिपा सकता ॥ 30 ॥
जाओ जाकर देखो उन्हें , जो तुम्हारे कारण रोए हैं |
तुम्हारे हठ से विवश होकर , रिश्ते जिन्होंने खोए हैं . ॥ 31 ॥
मन्दिर में बैठकर रोने पर भी, कर्मभोग भरना होगा |
कल जो वृक्ष लगाया था , फल उसी का अब चखना होगा ॥ 32 ॥
अंतर्मन की यदि मानो , अपनी भूलों को स्वीकार करो |
जो शेष बचे क्षण जीवन के , उनमें भूलों का प्रतिकार करो ॥ 33 ॥
आह ईश्वर के दर पर भी थी , शांति न मुझको मिल पायी |
जिसे भूल चुकी थी मैं , उस बीते कल की याद आयी ॥ 34 ॥
बीते कल को साथ लिए, जब मैंने था घर में कदम रखा |
बेटे का कमरा मिला बंद , दुर्गन्ध ने था घर को जकड़ रखा ॥ 35 ॥
मेरी चिंता भी थी किसको , जो आकर पूंछता मेरा हाल |
बिस्तर पर थी लुढ़की मैं , होकर पूरी तरह निढ़ाल ॥ 36 ॥
बहू ने था आदेश दिया , मम्मी जी खाना ले लीजिए ।
थकी हुई हूँ बुरी तरह, अब और न मुझको तंग कीजिए ॥ 37 ॥
पुत्र वधू की वाणी सुनकर, मन था और उद्धिग्न हुआ ।
निढ़ाल शरीर में मेरे ज्यों, जलती अग्नि का था स्पर्श हुआ ॥ 38 ॥
निद्रा मुझे न आनी थी, विचारों की लहरें हिलोरें लेती थीं ।
बीते हुए दिनों की यादें, मन को झकझोर देती थीं ॥ 39 ॥
वह भी एक समय था, जब मैं ब्याह कर घर में आई थी ।
सारे परिवार के लिए, इक नई खुशी ज्यों छाई थी ॥ 40 ॥
सास-श्वसुर देवर-ननद, सब मुझसे स्नेह रखते थे ।
मैं सबकी प्रिय थी, सब मेरा पूरा आदर करते थे ॥ 41 ॥
समय बीतते मैं, तीन बच्चों की थी बनी माता ।
एक बेटी दो बेटों के संग था , समय रहा आता जाता ॥ 42 ॥
देवर-ननद के भी थे , विवाह हुए उनके भी परिवार बसे ।
कुछ नए सदस्यों ने थी ली किलकारी , कुछ चलने-फिरने से थे विवश हुए ॥ 43 ॥
सारे सदस्य घर भर के , मेरे इशारों पर चलते थे |
बेटे-बेटी की बात ही क्या , पति भी मेरा मान रखते थे ॥ 44 ॥
समय बीतते नियम सृष्टि का था , हम पर साकार हुआ ।
सास-श्वसुर संग छोड़ चले, परिवार का नव विस्तार हुआ ॥ 45 ॥
ना जाने किन कमजोर क्षणों में, स्वार्थ नें था मुझमें जन्म लिया ।
खुद के भाई-बहनों के , स्नेह ने था मुझको जकड़ लिया ॥ 46 ॥
देवर-ननद थे लगे मुझे ज्यों, भाई-बहन के प्रतिद्धंदी ।
स्वार्थी प्रेम के आकर्षण ने, मुझे बनाया था बंदी ॥ 47 ॥
मन में भड़की स्वार्थाग्नि ने, नव कुंठा को भड़काया था ।
स्नेह प्रेम का किया नाश, प्रतिशोध अग्नि को उकसाया था ॥ 48 ॥
स्नेह प्रेम को त्याग, स्वर्थाग्नि मन में थी भड़क उठी ।
परिवारिक स्नेह करने को भस्म , मन में थी एक हूक उठी ॥ 49 ॥
स्नेहिल वचन थे भगे दूर , तीखे व्यंग्यों ने जन्म लिया ।
कटु वचनों की बरसात हुई, रिश्तों में दरारों ने था विस्तार लिया ॥ 50 ॥
कुछ समय तो परिवार ने, चुप रह कर सब कुछ था किया सहन ।
व्यंग्य बाणों के विष पीकर भी, अपमान अग्नि को किया वहन ॥ 51 ॥
पति को भी दिये थे ताने खूब , सम्बन्धों को था कोसा जम कर ।
देवर ननद के थे दोष गिनाये, खूब पानी पी पी कर ॥ 52 ॥
पति ने रखा था धैर्य, किंतु स्वार्थ ने मुझको किया अधीर ।
किस तरह हो सम्बन्ध खत्म, मेरे मन में थी तीव्र पीर ॥ 53 ॥
मानव मन भी कब तक आखिर, व्यंग्य बाण सह सकता है ।
विवश होकर मानव इक दिन , प्रतिकार भयंकर करता है ॥ 52 ॥
आखिर इक दिन था प्रतिकार हुआ, मैं आस में जिसके बैठी थी ।
वाकयुद्ध की अग्नि थी दहक उठी, आखिर जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी ॥ 53 ॥
प्रथम सफलता थी मिली उस दिन ,जब इक देवर ननद से संबन्ध समाप्त हुए ।
एक़ और राह के काँटे, व्यंग्य बाणों से थे परास्त हुए ॥ 54 ॥
घर में खिंची थी दीवारें, इक-दूजे का मुँह देखना था हुआ बन्द ।
मायके के सगे सम्बन्धियों के, आने से छाया था मन में आनन्द ॥ 55 ॥
मेरा इच्छा थी पूर्ण हुई , मन मयूर हुआ था पुलकित ।
मायके का मेरे था हुआ राज, मैं थी ह्रदय से प्रफुल्लित ॥ 56 ॥
नहीं पता था उस क्षण, कि कर्मों का फल भरना होगा ।
आज मैंने जो कृत्य किए, कल मुझे वही चखना होगा ॥ 57 ॥
मेरे किए हुए कर्मों को, बेटे-बेटी हैं देख रहे ।
बीते हुए कल का फल देने को, बाट समय की देख रहे ॥ 58 ॥
समय का पंक्षी था लगा उड़ने, नव रिश्तों था हुआ विस्तार ।
एक दामाद दो बहुओं ने, आकर स्वपनों को किया साकार ॥ 59 ॥
नए मेहमानों का था हुआ आगमन, खुशियों ने मानों था डाला डेरा ।
पर समय न किसी का सदा रहता, मुसीबतों का भी है पड़ता फेरा ॥ 60 ॥
पति की सेहत थे लगी गिरने , पकड़ा बिस्तर तो नहीं उठे |
ना जाने क्या गम उनको था , भीतर ही भीतर दहक उठे || 62 ||
जीवन से साथ छोडकर ही , उन्होंने था बिस्तर छोड़ा |
मैं हुई सोहागन से विधवा , चूड़ियों को था मैंने फोड़ा || 63 ||
भाई की अर्थी को बहन ने, सड़क पर ही था किया प्रनाम |
अनुजों ने दी थी मौन श्रद्धांजली , लौटे थे घर में जपते हरि नाम || 64 ||
पति के जाते ही , बेटों ने था नया रूप फिर दिखलाया |
दोस्तों संग लगीं थीं जुटने महफिलें , संस्कारों को था ठेंगा दिखलाया || 65 ||
बेटी ने थे सास श्वसुर छोड़े , नया ठौर इक था बसाया |
सास श्वसुर की सेवा करना था , उसे नहीं बिलकुल भाया || 66 ||
बेटी ने जब अपना घर था छोड़ा , तब फटी नहीं मेरी छाती |
भाई ने बहन को छोड़ा था , तब लगा लुटी कोई थाती || 67 ||
पति था खोया बेटे खोये , बेटी भी थी खोने वाली |
जीवन में था क्या शेष बचा , जिसे थी मैं अब बचाने वाली || 68 ||
रिश्तों की कदर यदि की होती , तो यह दिन आज नहीं आता |
मेरे ही कर्मों से हुआ बाम , मुझ पर आज विधाता || 69 ||
मेरे कर्म थे आज मुझ पर , लाठी बन कर बरस रहे |
बेटी का भविष्य सोचकर आँसू , आँखों आँखों से थे छलक रहे || 70 ||
भूलों के प्रतिकार का , संदेश मिला था मन्दिर में |
वही शब्द थे गूँज रहे , क्षण क्षण मेरे अंतर में || 71 ||
भूलों का प्रतिकार करो , इस चिन्तन में थी आँख लगी |
पौ जब फटी तो , मन-मंथन से प्राश्च्यित की थी आस जगी || 72 ||
जीवन के जो क्षण शेष बचे , वे व्यर्थ नहीं अब जाएंगे |
अपनी भूलों का कर प्राश्च्यित , अंतर में शान्ति पाएंगे || 73 ||
आखिर मैंने था ठान लिया , अब समय नहीं खोने दूंगी |
जितना खोना था खो चुकी , जो शेष बचा उसे संजोउगी || 74 ||
बची शक्ति को था किया एकत्र , अंतर को था दिया सम्बल |
ह्रदय में बसे हुए डर को था दूर भगाया , मन को था मैंने दिया नव बल || 75 ||
बेटे-बहू थे जाने वाले , बोले मम्मी है बिजी शिड्यूल |
मैंने कहा था सुनो अब मेरी , बहुत कर चुकी पहले मैं भूल || 76 ||
बहुत किया मनमानी तुमने , मैंने बहुत बर्दाशत किया |
जुबाँ रही खामोश , क्योंकि मैंने भी था पाप किया || 77 ||
मेरी साँसे अभी चल रहीं , संस्कारों का होगा नाश नहीं |
घर की मर्यादाओं का , अब होगा और विनाश नहीं || 78 ||
मद्यपान ना होगा घर में , सीमा में ही रहना होगा |
महफिलें नहीं जमेंगी घर में , घर को घर ही बनना होगा || 79 ||
बहुएँ बोलीं माता जी , हमें तो खूब उपदेश दिया |
क्या अपनी बहकी बेटी को भी, कोई नव संदेश दिया || 80 ||
मैंने कहा सही कहती हो , बेटी सास-श्वसुर के घर जायेगी |
सास-श्वसुर को अपनाकर ही , इस घर में कदम रख पायेगी || 81 ||
तुमको मैंने दिया संदेशा , अब बेटी के घर जाउंगी |
टूटे सम्बन्धों की माला के मनके , पिरोकर ही घर आउंगी || 82 ||
बेटे थे बोले मम्मी , क्या तुमने अजब सपना देखा |
जो हो न सके कभी पूरी , उस आशा को मन में बसा रक्खा || 83 ||
मैंने कहा था सुनो बच्चो. , मैंने है तुमको जनम दिया |
मेरा निश्चय है अटल , मैंने सुधार का प्रण है लिया || 84 ||
भावुक नहीं बनूंगी मैं , आँसू अब न बहाऊँगी |
कर्तव्य जो छोड़ा था पीछे , अब आगे उसे निभाऊँगी || 85 ||
ईश्वर मुझे शक्ति देगा , मेरा आदेश चलेगा घर में |
बिछुड़े रिश्ते जुडेगें फिर से , आनन्द मनेगा आंगन में || 86 ||
मेरी अंतिम यात्रा से पहले , संबंध सभी जुड़ जाएंगे |
रिश्तों की डोरी में बंधकर , हम फिर से मोद मनाएंगे || 87 ||
यह न समझना केवल बेटी ही , इस घर में वापस आएगी |
हर टूटे सम्बन्ध की रात्रि , सुबह बनकर जगमगाएगी || 88 ||
अब मैं निकलती हूँ घर से , वापस आने तक तुम बदल जाना |
इस बूढ़े तन की शक्ति को , तुमने नहीं है पहचाना || 89 ||
मेरा निश्चय है अटल , तुम्हें अब जीवन की राह बदलनी है |
जो पथ भटकाता हो तुमको , उस पर चलना बदचलनी है || 90 ||
मेरे लौटने पर तभी मिलना , यदि आदेश मेरा हो कबूल |
मुझको अशक्त समझने की , करना अब नहीं भयंकर भूल || 91 ||
मनमानी यदि करनी हो , तो छोड़ के घर जाना होगा |
मरने पर भी आ ना सकोगे , जीवन खुद ही बसाना होगा || 92 ||
ईश्वर को कर मन में प्रणाम , मैंने बाहर कदम रखा |
दृढ़ निश्चय की पूंजी लेकर , प्रश्च्यित के पथ पे कदम रक्खा || 93 ||
बेटे-बहू थे खड़े अवाक , इतनी शक्ति कहाँ से आई |
किस मायावी की पड़ी है , इस बूढ़े तन पर परछाईं || 94 ||
इस पथ पर थी मैं चली अकेली मै , पर मन था अटूट विश्वास |
जिस ईश्वर ने कराया मुझको , मेरी भूलों का अहसास || 95 ||
वही इस संकल्प पथ पर , कदम नहीं डिगने देगा |
मेरा प्राश्च्यित पूर्ण करेगा , अब और नहीं गिरने देगा || 96 ||
ज्यों ही मैंने था बढ़ाया कदम , बोझ ह्रदय का शांत हुआ |
मन का बोझ था हल्का हुआ , पर उद्धिग्न मन फिर अशांत हुआ || 97 ||
ईश्वर जब हो सहयोगी , मानव सब संभव कर लेता है |
मन का अटूट विश्वास , दुर्गम पथ के कष्ट हर लेता है || 98 ||
टूटे सम्बन्ध जोड़ने में था , लगा समय वर्ष भर का |
ह्रदय से प्रश्च्यित करने को , मैंने था किया तप ज्यों जीवन भर का || 99 ||
आखिर टूटे रिश्तों को , मेरी सच्चाई का जब भान हुआ |
पति के अधूरे सपनों का , था जाकर तब सम्मान हुआ || 100 ||
घर में थी आई फिर से खुशी , मेरा कर्तव्य था पूर्ण हुआ |
मेरा प्राश्च्यित था पूर्ण हुआ , अंतर मंथन था सम्पूर्ण हुआ || 101 ||
परिवार में फिर से देख खुशी फिर से , अश्रुधार थी बह निकली |
जीवन-साथी की फोटो के समक्ष , अंतर की व्यथा थी फूट चली ||
जीवन रहे या जाये , अब नहीं है मुझको इसका गम |
मैंने भूलों का किया प्रश्चिय्त, अंतर मेरा हुआ है नम ||
हे जग के स्वामी , इतनी शक्ति मुझे देना |
जब छाये निराशा की रात्रि , ऐसी ही शक्ति मुझे देना ||

6 Comments

  1. babucm C.m.sharma(babbu) 10/07/2016
    • अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव aklesh1960 11/07/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 11/07/2016
    • अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव aklesh1960 15/07/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 11/07/2016
    • अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव aklesh1960 15/07/2016

Leave a Reply