इंतज़ार

आँखो में मौन संजोए खड़ा था ,
वह सुखा पेड़ अरसो से |
और साथ में थी शान्ति |
वैसा मौन, वैसी शान्ति जैसे
पास के गाँव में मर गया हो कोई जवान व्यक्ति |
लेकिन उसे इंतजार था किसी और के आने का |
किसी ऐसे मेहमान का जो गम नहीं,
खुशिया बिखेर दे,अनहद खुशिया |
मुझे लगा शायद उसे इंतजार था आकाश में
काले काले घुमड़ते बादलो का |
हाथ में हल लिये किसानों का|
माथे पर पसीने की चमक से भरे किसानों का |
जो चौ दिशाओ में खुशिया बिखेर दे, अनहद खुशिया |
फिर मेरे अन्दर के कवि ने प्रश्न पूछा-
इंतज़ार में तो बेचैनी होती है|
फिर यह मौन कैसा?
मुझे बेचैन करने वाली शान्ति कैसी ?
तब भान हुआ मुझको,
वो शन्ति थी निशानी उस थकान की,
जो इन्तज़ार ने उसे इनाम में दिया था|
वो मौन था उन जख्मो के कारण ,
जो खुदगर्जो ने दिया था उसे इनाम में |
वन काटकर, धरती का सीना चीरकर ,
आँखो पर पट्टी बांधकर |
अब तक अन्दर दबा कवि मुझ पर हावी हो गया|
मैने एक कोरा पन्ना निकाला, एकदम कोरा |
और नीले खून में डूबी शमशीर |
और उतार दिया अपने दिल का गुबार
जो मेरे दिल में था उन कृतघ्नो के लिए |
अब मेरी शमशीर रुपी कलम मे
खून जैसी उबाल थी, एकदम लाल खून जैसी
वही पास में बैठे एक सज्जन ने पूछा –
तुम ऐसा क्यूँ लिखते हो ?
मैने मुस्कुराकर प्रत्युतर दिया
मैं लिखूँगा लिखता रहूंगा |
जमाने को जगाने के लिए|
लोगों की सोई चेतना को नींद से उठाने के लिए|
मैं लिखूँगा लिखता रहूंगा |

3 Comments

  1. babucm C.m.sharma(babbu) 09/07/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 09/07/2016

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