एक प्रेयसी की बात

एक प्रेयसी की बात
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ख़ामोशी से मेरे बातो को पढ़ते गए
छुपा छुपा के सब से…
सुनते गए
आवाज़ों को मेरी
एक मुस्कुराहट
होठों के पीछे छुपा कर….
है कि नहीं…?
बोलो तो जरा…
एक गहरी ठंडी सांस भरी
और फिर छोड़ दी…
फिर ख़ुद को ख़ुद में
समेट लिया
सिकुड़ कर..
और
और ज्यादा गहराई से याद करने लगे…

तुम ऐसे हो
तुम वैसे हो
पर जैसे हो
बहुत अच्छे हो
सच्चे हो
पर थोड़े झूठे हो
कुछ कहते क्यों नहीं
सिर्फ बातें बनाते हो..
हमें कब से इंतज़ार है
की तुम कुछ कहो
कुछ नहीं
तुम सब कुछ कहो
और मैं तुम्हे
देखती रहूँ
तुम कहते कहते थक जाओ
थक के सो जाओ…
तो भी मैं तुमको देखती रहूँ
निहारती रहूँ ……।

-हरेन्द्र पंडित

7 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 09/07/2016
  2. Sukhmangal Singh sukhmangl 09/07/2016
  3. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 09/07/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/07/2016
  5. mani mani 09/07/2016
  6. Harendrra Pandit Harendrra Pandit 09/07/2016

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